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बुधवार, 15 मार्च 2023

हमें गोंड गोंडी गोंडवाना पर ध्यान देना चाहिए।

 गोंड भी अपने हिसाब से अलग अलग संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं तो संगठित कैसे हो पायेंगे, कोई मनुवादी व्यवस्था का प्रतिनिधित्व, कोई बामसेफ का प्रतिनिधित्व, कोई किसी बाबाओं का प्रतिनिधित्व बस अपने मूल पहचान की बात कर दें। तो मूलनिवासी बहुजन की बात करने लग जाते हैं। हम क्यों अपने मूल पहचान की बात नहीं करते? जबकि गोंडों की व्यवस्था पूरी दुनिया में होने वाली समस्याओं का हल दे सकती है, ऐसी व्यवस्था है। पर नहीं हमें तो फिलहाल दूसरों की बातों को ही सही मानते हुए परबुधिया बने रहना, कुछ संगठन एक दूसरे का विरोध कर कर के एक दूसरे को बचाने का भी काम कर रहे हैं, और हम उनके विरोध को सही मानते हुए लहालोट होते रहते हैं। जबकि हमें गोंड गोंडी गोंडवाना पर ध्यान देना चाहिए। और एक बात गोंड को बांटने का काम मनुवादी ही नहीं, बहुजन, बामसेफ, अंबेडकरवादी आदि संगठनों ने किया है। जिसका परिणाम यह कि हम हमारे भाइयों को ही ग़लत साबित कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि हम दूसरों का चश्मा लगाए हैं। जबकि हम सब को चाहिए कि दूसरों का चश्मा उतार कर खुद का आइना पकड़ना चाहिए। वर्ना थाई और चंपाई की कहानियों में हम खुद को ढुंढते रहेंगे और थाई और चंपाई हमारी काटते रहेंगे। जब 3% पूरे देश में अपनी फर्जी कहानियों के दम पर राज कर सकते हैं तब तो हम गोंडों की संख्या उन से तो ज्यादा ही हैं, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ साथ गोंडवाना की व्यवस्था समृद्धशाली पहचान अलग। जबकि थाई और चंपाई की जमीन थी न इतिहास था, हांडी और झाड़ू की फर्जी कहानियों बता बता कर एक दूसरे को प्रमोट करते रहते हैं और नीली किताब के कारण शासन और सत्ता में बैठे हुए हैं। इसलिए अब जरूरत स्वयंभू बनने की खुद के घर को साफ करने की कब तक किराये के मकान को चमकाते रहोगे। रही बात ईवीएम की, ईवीएम का कितना भी विरोध कर लीजिए फैसला सत्ता में बैठे हुए लोगों की मंशा से ही संभव है। जो लोग सिर्फ 90 वर्ष सत्ता में बैठने के लिए तैयारी किये हैं तो सोच सकते हैं ईवीएम मशीन उनके लिए कितना महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है तो उस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का साधन ईवीएम है।

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